🌳 फ़िशर फ़ॉरेस्ट — 1884 में लगाया गया जंगल, आज उसमें शेर रहते हैं🌊 पचनद — पाँच नदियों का संगम, दुनिया में ऐसी जगह गिनी-चुनी हैं🐊 चंबल में दुनिया के सबसे ज़्यादा घड़ियाल — और सबसे ज़्यादा बच्चे इटावा रेंज में🌳 फ़िशर फ़ॉरेस्ट — 1884 में लगाया गया जंगल, आज उसमें शेर रहते हैं🌊 पचनद — पाँच नदियों का संगम, दुनिया में ऐसी जगह गिनी-चुनी हैं🐊 चंबल में दुनिया के सबसे ज़्यादा घड़ियाल — और सबसे ज़्यादा बच्चे इटावा रेंज में
जगहें, और उनके पीछे की असली कहानियाँ

1884 का जंगल, जिसमें
आज शेर रहते हैं

इटावा वाले अपने शहर को "छोटा शहर" कहकर टाल देते हैं। पर यहाँ पाँच नदियाँ मिलती हैं, दुनिया के सबसे ज़्यादा घड़ियाल रहते हैं, और एशिया की सबसे बड़ी सफारियों में से एक है। बात जगहों की कम है — कहानियों की ज़्यादा।

जो शायद आपको स्कूल में नहीं बताया गया

इटावा का इतिहास

यह शहर सिर्फ़ जगहों का नहीं — कुछ ऐसी कहानियों का भी है जो देश के इतिहास से जुड़ती हैं।

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1856–1867 · ग्यारह साल

जिस आदमी ने कांग्रेस बनाई, वह इटावा का कलेक्टर था

एलन ऑक्टेवियन ह्यूम — ज़िले के अपने अभिलेख में दर्ज

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई। उसे बनाने वाले एलन ऑक्टेवियन ह्यूम थे — एक अंग्रेज़ अफ़सर। और उससे पहले, 1856 से 1867 तक — पूरे ग्यारह साल — वे इटावा के कलेक्टर व मजिस्ट्रेट थे।

1857 का विद्रोह उन्हीं के कार्यकाल में हुआ। उन्हें छह महीने आगरा के क़िले में शरण लेनी पड़ी। पर जब वे जनवरी 1858 में लौटे, तो एक को छोड़कर उनके सारे भारतीय अधिकारी वफ़ादार बने रहे थे। उन्होंने विद्रोह का दोष अंग्रेज़ों की अपनी नाकामी पर डाला, और पकड़े गए विद्रोहियों के साथ "दया व संयम" की नीति अपनाई — सिर्फ़ सात लोगों को फाँसी हुई। इटावा उन पहले ज़िलों में था जो साल भर में सामान्य हो गए — जो बाक़ी जगहों पर संभव नहीं हुआ।

पर असली बात इसके बाद की है। ह्यूम ने यहाँ 1857 तक 181 स्कूल खोल दिए थे, जिनमें 5,186 बच्चे पढ़ते थे — और उनमें दो लड़कियाँ भी थीं। उस ज़माने में। जो हाई स्कूल उन्होंने अपने पैसे से बनवाया, वह आज भी चल रहा है — अब जूनियर कॉलेज के रूप में — और कहते हैं उसका नक़्शा अंग्रेज़ी के अक्षर "H" जैसा है।

1859 में उन्होंने कुँअर लक्ष्मण सिंह के साथ मिलकर एक हिंदी पत्रिका शुरू की — "लोकमित्र"। शुरू में यह सिर्फ़ इटावा के लिए थी, फिर इसका नाम फैल गया। 1863 में उन्होंने बच्चों को कोड़े मारने व जेल भेजने के बजाय सुधार गृह की व्यवस्था कराई।

और एक बात जो इस पन्ने से सीधे जुड़ती है: ह्यूम भारत के सबसे बड़े पक्षी-विज्ञानियों में गिने जाते हैं। उन्होंने इटावा में रहते हुए यहाँ के पक्षियों का अध्ययन किया और संग्रह बनाया — जो 1857 में नष्ट हो गया, और उन्होंने दोबारा बनाया। बाद में उन्होंने "Stray Feathers" नाम की पत्रिका निकाली, जो भारत में पक्षी-अध्ययन की नींव मानी जाती है।

यानी जिस आदमी ने भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनाई, वह इसी शहर में बैठकर पक्षी गिनता था। और आज उसी ज़िले में रामसर की आर्द्रभूमि है जिसमें 400 सारस हैं, और दुनिया के सबसे ज़्यादा घड़ियाल। यह इत्तेफ़ाक़ है — पर सुंदर इत्तेफ़ाक़ है।

1856–67
इटावा में कलेक्टर
181
स्कूल खोले · 5,186 बच्चे
1859
"लोकमित्र" हिंदी पत्रिका
1885
कांग्रेस की स्थापना
पुराने गज़ेटियर में दर्ज है: "प्रांत के बहुत कम ज़िले महान विद्रोह के दौरान अपने निवासियों की वफ़ादारी में इटावा की बराबरी कर सकते हैं... इसका लगभग पूरा श्रेय मि॰ ह्यूम को जाता है... उनका नाम आज भी लोगों की स्मृति में कृतज्ञता के साथ बसा है।"
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भारत की महान बाड़ (Great Hedge)

अंग्रेज़ों ने नमक पर कर वसूलने के लिए पूरे भारत में हज़ारों किलोमीटर लंबी काँटेदार बाड़ खड़ी की थी — एक जीती-जागती दीवार, जिसे पार करके नमक नहीं ले जाया जा सकता था। इतिहास की सबसे अजीब चीज़ों में से एक।

ज़िले के अभिलेख के अनुसार उस बाड़ के अवशेष इटावा में हैं। ज़्यादातर लोगों को यह पता ही नहीं।

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गुलाब राय

प्रसिद्ध हिंदी लेखक व निबंधकार गुलाब राय इटावा के थे। हिंदी साहित्य पढ़ने वाला हर छात्र उनका नाम जानता है — पर बहुत कम लोगों को पता है कि वे इसी शहर से थे।

यह उन बातों में है जो शहर को अपने बारे में ख़ुद नहीं पता होतीं।

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1857 का केंद्र

इटावा 1857 के विद्रोह का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। ज़िले के अभिलेख इसे साफ़ दर्ज करते हैं। दिल्ली–आगरा–कानपुर के बीच होने की वजह से यह इलाक़ा बार-बार सेनाओं का रास्ता व मैदान बना।

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और उससे भी पुराना

ज़िले के अभिलेख के अनुसार यहाँ की ज़मीन का इतिहास बहुत पीछे जाता है — प्राचीन काल में यहाँ पांचाल रहते थे, महाभारत व रामायण की कथाओं में इस क्षेत्र का ज़िक्र आता है, और चौथी सदी में यह गुप्त वंश के अधीन था।

स्रोत के बारे में ईमानदारी: ऊपर की जानकारी ज़िले के आधिकारिक अभिलेख (etawah.nic.in), गज़ेटियर व सार्वजनिक स्रोतों से ली गई है। इतिहास के कुछ हिस्सों पर स्रोत आपस में सहमत नहीं हैं — जैसे सुमेर सिंह किले का काल। ऐसी जगहों पर दोनों मत यहाँ दिए गए हैं। कोई जानकारी ग़लत लगे या आपके पास बेहतर स्रोत हो, तो हमें बताइए — हम सुधार देंगे।

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