भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई। उसे बनाने वाले एलन ऑक्टेवियन ह्यूम थे — एक अंग्रेज़ अफ़सर। और उससे पहले, 1856 से 1867 तक — पूरे ग्यारह साल — वे इटावा के कलेक्टर व मजिस्ट्रेट थे।
1857 का विद्रोह उन्हीं के कार्यकाल में हुआ। उन्हें छह महीने आगरा के क़िले में शरण लेनी पड़ी। पर जब वे जनवरी 1858 में लौटे, तो एक को छोड़कर उनके सारे भारतीय अधिकारी वफ़ादार बने रहे थे। उन्होंने विद्रोह का दोष अंग्रेज़ों की अपनी नाकामी पर डाला, और पकड़े गए विद्रोहियों के साथ "दया व संयम" की नीति अपनाई — सिर्फ़ सात लोगों को फाँसी हुई। इटावा उन पहले ज़िलों में था जो साल भर में सामान्य हो गए — जो बाक़ी जगहों पर संभव नहीं हुआ।
पर असली बात इसके बाद की है। ह्यूम ने यहाँ 1857 तक 181 स्कूल खोल दिए थे, जिनमें 5,186 बच्चे पढ़ते थे — और उनमें दो लड़कियाँ भी थीं। उस ज़माने में। जो हाई स्कूल उन्होंने अपने पैसे से बनवाया, वह आज भी चल रहा है — अब जूनियर कॉलेज के रूप में — और कहते हैं उसका नक़्शा अंग्रेज़ी के अक्षर "H" जैसा है।
1859 में उन्होंने कुँअर लक्ष्मण सिंह के साथ मिलकर एक हिंदी पत्रिका शुरू की — "लोकमित्र"। शुरू में यह सिर्फ़ इटावा के लिए थी, फिर इसका नाम फैल गया। 1863 में उन्होंने बच्चों को कोड़े मारने व जेल भेजने के बजाय सुधार गृह की व्यवस्था कराई।
और एक बात जो इस पन्ने से सीधे जुड़ती है: ह्यूम भारत के सबसे बड़े पक्षी-विज्ञानियों में गिने जाते हैं। उन्होंने इटावा में रहते हुए यहाँ के पक्षियों का अध्ययन किया और संग्रह बनाया — जो 1857 में नष्ट हो गया, और उन्होंने दोबारा बनाया। बाद में उन्होंने "Stray Feathers" नाम की पत्रिका निकाली, जो भारत में पक्षी-अध्ययन की नींव मानी जाती है।
यानी जिस आदमी ने भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनाई, वह इसी शहर में बैठकर पक्षी गिनता था। और आज उसी ज़िले में रामसर की आर्द्रभूमि है जिसमें 400 सारस हैं, और दुनिया के सबसे ज़्यादा घड़ियाल। यह इत्तेफ़ाक़ है — पर सुंदर इत्तेफ़ाक़ है।