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शहर से 5 किमी · इटावा-ग्वालियर रोड

इटावा सफारी पार्क

फ़िशर फ़ॉरेस्ट · 350 हेक्टेयर · नवंबर 2019 से जनता के लिए

यह कहानी शेरों से नहीं, पेड़ों से शुरू होती है। 1884 में — यानी आज से लगभग 140 साल पहले — अंग्रेज़ों के ज़माने में यहाँ के बीहड़ों को रोकने के लिए एक जंगल लगाया गया था। मक़सद सीधा था: मिट्टी बह रही थी, कटान बढ़ रहा था, इसलिए पेड़ लगाओ। उस जंगल का नाम पड़ा फ़िशर फ़ॉरेस्ट — और यह प्रदेश के सबसे पुराने वृक्षारोपणों में गिना जाता है।

किसी ने तब सोचा भी नहीं होगा कि सवा सौ साल बाद उसी जंगल में एशियाई शेर घूमेंगे।

2005 में लायन ब्रीडिंग सेंटर का विचार आया, 2012 में काम शुरू हुआ। डिज़ाइन स्पेन की कंपनी Art Urbà ने बनाया, और अधिकारी इंग्लैंड के मशहूर Longleat Safari Park तक देखने गए। 2014 में गुजरात के गिर और कानपुर चिड़ियाघर से शेर लाए गए। और नवंबर 2019 में यह जनता के लिए खुला।

यहाँ आप पिंजरे में नहीं होते, गाड़ी में होते हो — और जानवर खुले घूमते हैं। शेर के लिए ही 50 हेक्टेयर का इलाक़ा है। और हाँ, अंदर भारतीय सेना के दो विजयंता टैंक और एक पुराना भाप का इंजन भी खड़ा है — जिसका शेरों से कोई लेना-देना नहीं, पर बच्चों को सबसे ज़्यादा वही पसंद आता है।

1884
फ़िशर फ़ॉरेस्ट लगाया गया
350
हेक्टेयर में फैला
8 किमी
परिधि — एशिया की बड़ी सफारियों में
नव॰ 2019
जनता के लिए खुला
जाने से पहले: समय व टिकट मौसम के हिसाब से बदलते हैं — जाने से पहले पुष्टि कर लो। जीप/बस सफारी अनिवार्य है, पैदल नहीं जा सकते। सुबह जल्दी जाओ — जानवर तब ज़्यादा दिखते हैं। गर्मियों में दोपहर बेकार जाती है। रख-रखाव केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) के नियमों से होता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

इटावा सफारी पार्क कहाँ है?
शहर से 5 किमी · इटावा-ग्वालियर रोड। फ़िशर फ़ॉरेस्ट · 350 हेक्टेयर · नवंबर 2019 से जनता के लिए
इटावा सफारी पार्क जाने का सबसे अच्छा समय क्या है?
जाने से पहले: समय व टिकट मौसम के हिसाब से बदलते हैं — जाने से पहले पुष्टि कर लो। जीप/बस सफारी अनिवार्य है, पैदल नहीं जा सकते। सुबह जल्दी जाओ — जानवर तब ज़्यादा दिखते हैं। गर्मियों में दोपहर बेकार जाती है। रख-रखाव केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) के नियमों से होता है।
इटावा सफारी पार्क का इतिहास क्या है?
यह कहानी शेरों से नहीं, पेड़ों से शुरू होती है। 1884 में — यानी आज से लगभग 140 साल पहले — अंग्रेज़ों के ज़माने में यहाँ के बीहड़ों को रोकने के लिए एक जंगल लगाया गया था। मक़सद सीधा था: मिट्टी बह रही थी, कटान बढ़ रहा था, इसलिए पेड़ लगाओ। उस जंगल का नाम पड़ा फ़िशर फ़ॉरेस्ट — और यह प्रदेश के सबसे पुराने वृक्षारोपणों में गि…

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