पचनद
संगम शब्द सुनते ही प्रयाग याद आता है, जहाँ दो नदियाँ मिलती हैं। पचनद पर पाँच मिलती हैं — यमुना, चंबल, सिंध, कुँवारी और पहूज। दुनिया भर में ऐसी जगहें उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं, और वह एक जगह इटावा में है।
यहाँ खड़े होकर देखो तो पानी का रंग अलग-अलग दिखता है — चंबल का साफ़ हरा-नीला, यमुना का गँदला भूरा। दोनों कुछ दूर तक साथ-साथ बहते हैं, बिना मिले, जैसे दो अजनबी। फिर धीरे-धीरे घुल जाते हैं।
और यहीं इस जगह का सबसे बड़ा राज़ है, जो ज़्यादातर लोग नहीं जानते: यमुना दिल्ली और आगरा से गंदी होकर आती है। चंबल यहाँ उसमें साफ़ पानी डालती है। यानी आगे गंगा तक जो यमुना पहुँचती है, उसे साँस पचनद पर मिलती है। पूरी बात नदी वाले पन्ने पर।
चारों ओर बीहड़ हैं — वही चंबल के बीहड़ जिनकी कहानियाँ सुनकर हम बड़े हुए। शाम के वक़्त, जब सूरज उन कटी-फटी मिट्टी की दीवारों पर पड़ता है, तो पूरा इलाक़ा सुनहरा हो जाता है। कोई टिकट नहीं, कोई गेट नहीं।