राजा सुमेर सिंह का किला
अगर इटावा से किसी एक चीज़ को पहचान माना जाए, तो वह यह किला है। यमुना के किनारे एक टीले पर खड़ा — और ज़िले की आधिकारिक पर्यटन सूची में सबसे ऊपर।
सबसे मशहूर बात इसकी बारादरी है। नाम से लगता है बारह दरवाज़े होंगे — और होते भी बारह ही हैं। पर बनावट ऐसी है कि गिनने वाला हर बार उलझ जाता है: कभी ग्यारह निकलते हैं, कभी तेरह। बारह कभी नहीं। सदियों पहले किसी कारीगर ने यह चाल जानबूझकर रची थी।
और उससे भी दिलचस्प — इसके नीचे सुरंगें हैं। कहा जाता है कि एक सुरंग सीधे यमुना तक जाती थी, जहाँ रानियाँ नहाने जाती थीं। और एक सुरंग का रास्ता आगरा तक बताया जाता है। नीचे तहख़ाने भी थे। किले पर हनुमान जी का मंदिर है।
इतिहास को लेकर स्रोत एकमत नहीं हैं। ज़िले का अपना अभिलेख कहता है कि 1400-1401 में जब मल्लू इक़बाल ख़ान इस इलाक़े की ओर बढ़ा, तो इटावा के राय सुमेर सिंह ने उसका सामना किया। वहीं कुछ स्रोत इसे बुंदेला शासकों का, 17वीं सदी का बताते हैं। जो दर्ज है, वही यहाँ दिया गया है।